शीर्षक: एपिसोड 3 - टूटी कलम और अटूट हौसला
रात के सन्नाटे में जब पूरा गाँव गहरी नींद में सोया था, गीता की आँखें मोबाइल की हल्की रोशनी में चमक रही थीं। उसने अभी-अभी अपना दूसरा एपिसोड पब्लिश किया था। जैसे ही उसने 'सेंड' बटन दबाया, उसे लगा जैसे उसने अपने दिल का एक बोझ हल्का कर दिया हो। लेकिन उसे क्या पता था कि सुबह उसके लिए एक नई अग्निपरीक्षा लेकर आने वाली है।
सूरज की पहली किरण के साथ ही घर में कोहराम मच गया। हुआ यह कि गीता की सहेली राधा ने गलती से अपनी माँ के सामने गीता की कहानी का ज़िक्र कर दिया, और बात फैलते-फैलते गीता के भाई रमेश के कानों तक पहुँच गई।
जब गीता रसोई में चाय छान रही थी, रमेश पैर पटकते हुए अंदर आया। उसके हाथ में गीता की वही पुरानी डायरी थी जिसे वह अपनी जान से ज्यादा प्यार करती थी।
"ये क्या है गीता?" रमेश की आवाज़ में गुस्सा और नफरत साफ झलक रही थी। "सपनों की लेखिका? तू हमारे खानदान की इज़्ज़त नीलाम करेगी? गाँव भर में चर्चा है कि तू मोबाइल पर चोरी-छिपे क्या-क्या लिख रही है!"
गीता के हाथ से चाय की छलनी गिर गई। "भैया, वो... वो बस मेरी कहानियाँ हैं। मैं कुछ गलत नहीं कर रही।"
"गलत नहीं कर रही? पढ़ना-लिखना लड़कों का काम है, और इज़्ज़त बचाना लड़कियों का। आज ये डायरी है, कल तू बाहर निकलने की ज़िद करेगी!" इतना कहकर रमेश ने गीता की आँखों के सामने उस डायरी के पन्ने फाड़ दिए।
गीता के लिए वो सिर्फ कागज के टुकड़े नहीं थे, वो उसके सालों की मेहनत, उसके आँसू और उसके अरमान थे। वह ज़मीन पर गिरकर फटे हुए पन्नों को समेटने लगी। उसकी सिसकियाँ रसोई की दीवारों से टकराकर वापस आ रही थीं, लेकिन रमेश का दिल नहीं पसीजा। उसने गीता का मोबाइल भी छीनने की कोशिश की, पर गीता ने उसे कसकर अपने सीने से लगा लिया।
"भैया, आप कागज फाड़ सकते हैं, लेकिन मेरे दिमाग में चल रही कहानियों को कैसे रोकेंगे?" गीता ने पहली बार पलटकर जवाब दिया। उसकी आवाज़ में थरथराहट थी, पर आँखों में एक अजीब सी चमक।
उस दिन गीता ने खाना नहीं खाया। वह अपने कमरे के अँधेरे कोने में बैठी उन फटे हुए पन्नों को देख रही थी। उसे लगा कि शायद सब खत्म हो गया। लेकिन तभी उसके मोबाइल पर एक नोटिफिकेशन आया। उसने काँपते हाथों से फोन खोला।
Stck.me पर उसकी कहानी को किसी बड़े शहर के पाठक ने पढ़ा था और उसे 'Support' के रूप में ₹100 भेजे थे। साथ में एक मैसेज था: "गीता, आपकी कहानी ने मेरा दिल छू लिया। कभी रुकना मत, आपकी कलम में जादू है।"
वो ₹100 गीता के लिए एक लाख रुपये से भी बढ़कर थे। यह इस बात का सबूत था कि दुनिया उसे सुनना चाहती है, भले ही उसका अपना घर उसे चुप कराना चाहता हो। उसने अपने आँसू पोंछे और फटे हुए पन्नों को जोड़कर अपनी अगली कहानी की रूपरेखा तैयार की।
उसने एपिसोड 3 लिखना शुरू किया। इस बार उसके शब्द और भी कड़े थे। उसने लिखा— "कलम तोड़ देने से लेखिका नहीं मरती। लेखिका तब मरती है जब वह हार मान लेती है। मेरी डायरी फटी है, मेरा दिल टूटा है, लेकिन मेरा हौसला अब भी आसमान की ऊँचाइयों को नाप रहा है।"
उसने इस एपिसोड में समाज की उस बेड़ियों का वर्णन किया जो एक बेटी के बढ़ते कदमों को रोकना चाहती हैं। उसने लिखा कि कैसे एक छोटा सा 'सपोर्ट' किसी के डूबते हुए सपनों के लिए तिनके का सहारा बन जाता है।
शाम ढलते-ढलते गीता ने एपिसोड 3 को पूरा किया। यह अब तक का सबसे लंबा और सबसे प्रभावशाली एपिसोड था। उसने तय कर लिया था कि वह अब छुपकर नहीं, बल्कि डंके की चोट पर लिखेगी। उसे 70 एपिसोड तक पहुँचना था, और यह तो बस एक शुरुआत थी।
क्या गीता के पिता उसका साथ देंगे? क्या वह ₹100 उसके जीवन की पहली सीढ़ी बनेंगे?
अगले एपिसोड में जारी...
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