शीर्षक: एपिसोड 2 - बंद कमरा और खुली सोच
पहला एपिसोड इंटरनेट पर डालने के बाद गीता का दिल पूरी रात जोरों से धड़कता रहा। उसे डर था कि क्या किसी को उसकी कहानी पसंद आएगी? क्या कोई उस पर हँसेगा? सुबह जब गाँव की मस्जिद से अज़ान की आवाज़ गूँजी, गीता ने सबसे पहले अपना मोबाइल चेक किया। उसकी आँखों में चमक आ गई—उसकी कहानी पर 5 नए 'व्यूज' और एक कमेंट था। किसी अजनबी ने लिखा था, "बहुत ही भावुक शुरुआत! आगे क्या होगा?"
वो एक कमेंट गीता के लिए किसी अवॉर्ड से कम नहीं था। लेकिन उसकी खुशी के बीच एक दीवार खड़ी थी—उसका अपना घर।
गीता रसोई में चाय बना रही थी, तभी उसके बड़े भाई, रमेश, वहाँ आए। रमेश शहर में छोटी-मोटी नौकरी करते थे और उनका मानना था कि लड़कियों को सिर्फ घर के काम और सिलाई-कढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।
"गीता, आजकल देख रहा हूँ तू सारा दिन उस टूटे हुए मोबाइल में घुसी रहती है। क्या करती है उसमें?" रमेश ने शक भरी निगाहों से पूछा।
गीता का हाथ ठिठक गया। उसने चाय का कप संभालते हुए कहा, "कुछ नहीं भैया, बस कुछ पढ़ने लगी थी।"
"पढ़ना है तो चूल्हा-चौका पढ़, जो कल को ससुराल में काम आए। ये मोबाइल-वोबाइल शहर की लड़कियों के चोंचले हैं, हमारे गाँव में ये सब शोभा नहीं देता," रमेश ने कड़क आवाज़ में कहा और बाहर चले गए।
गीता की आँखों में आँसू भर आए। उसे लगा जैसे उसकी कलम की स्याही सूख रही हो। क्या उसके सपने सिर्फ इसलिए दम तोड़ देंगे क्योंकि वह एक लड़की है? उसने खुद से सवाल किया—क्या सिलाई मशीन चलाना ही उसकी नियति है? या वह इन अंगुलियों से दुनिया की सबसे खूबसूरत कहानियाँ लिख सकती है?
दोपहर के सन्नाटे में, जब सूरज की तपिश से पूरी गली सो रही थी, गीता अपने कमरे के कोने में जा बैठी। वह कमरा, जहाँ एक छोटी सी खिड़की थी जिससे आसमान का एक छोटा सा टुकड़ा दिखाई देता था। उसने अपनी पुरानी डायरी उठाई और फिर से लिखना शुरू किया।
“जब दुनिया आपके रास्ते बंद करने लगे, तो समझ लेना कि खुदा आपको अपना रास्ता खुद बनाने का मौका दे रहा है। गीता कुमारी हारेगी नहीं, वह लिखेगी... अपनी और अपने जैसी हज़ारों लड़कियों की कहानी।”
अचानक, उसकी सहेली राधा खिड़की के पास आई। "गीता! सुना तूने? गाँव के मुखिया जी की बेटी शहर से पढ़ाई पूरी करके लौटी है और वह यहाँ लड़कियों के लिए एक छोटा सा सेंटर खोल रही है।"
गीता की आँखों में एक नई उम्मीद जागी। उसने सोचा, अगर मुखिया की बेटी शहर जाकर पढ़ सकती है, तो वह घर बैठे अपनी लेखनी से शहर तक पहुँच सकती है। उसने मोबाइल उठाया और Stck.me पर अपना दूसरा एपिसोड टाइप करना शुरू किया।
इस बार उसने और भी गहराई से लिखा। उसने अपने भाई की डाँट, समाज की बंदिशें और एक लेखिका के मन की तड़प को शब्दों में पिरो दिया। उसने लिखा कि कैसे एक लड़की के लिए उसका मोबाइल सिर्फ एक यंत्र नहीं, बल्कि आज़ादी का एक औजार है।
लिखते-लिखते शाम हो गई। गीता को पता भी नहीं चला कि उसने कब 1000 से ज्यादा शब्द लिख डाले। उसके शब्द अब सिर्फ शब्द नहीं थे, वे एक विद्रोह थे।
उसने 'पब्लिश' बटन दबाने से पहले एक गहरी सांस ली। उसे पता था कि रास्ता कठिन है, लेकिन अब उसने पीछे मुड़कर न देखने का फैसला कर लिया था। उसने मन ही मन खुद से वादा किया—"अभी तो सिर्फ एपिसोड 2 है, मुझे 70 एपिसोड तक जाना है और अपनी पहचान बनानी है।"
क्या गीता का भाई उसकी कहानियों के बारे में जान पाएगा? क्या होगा जब गाँव में उसकी चर्चा होने लगेगी?
अगले एपिसोड में जारी...
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