एपीसोड:4 , पहचान का नया सवेरा
टूटी हुई कलम और जख्मी हौसलों को समेटकर गीता ने जब सुबह की पहली किरण को अपने कमरे की खिड़की से देखा, तो उसे महसूस हुआ कि पुरानी गीता कहीं पीछे छूट गई है। वह गीता जो हालातों से डरती थी, जो समाज के तानों से सहम जाती थी, अब उस गीता का अंत हो चुका था। रात भर की कशमकश और कागज पर बिखरी स्याही के बीच उसने एक बड़ा फैसला लिया। उसने सोचा, "अगर मेरी किस्मत मुझे मिटाना चाहती है, तो मैं अपनी किस्मत खुद लिखूँगी। लेकिन इस बार मेरी कलम किसी की दया की मोहताज नहीं होगी।" उसने अपनी डायरी उठाई और उसके पहले पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा— 'प्रिया कुमारी'। प्रिया— जिसका अर्थ है सबका प्यारा, और वह जो खुद से प्यार करना सीख गई हो। गीता ने खुद से कहा, "आज से दुनिया मुझे प्रिया के नाम से जानेगी। यह सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उन बेड़ियों से आजादी है जिन्होंने सालों से गीता को जकड़ रखा था। गीता कुमारी एक साधारण लड़की थी, लेकिन प्रिया कुमारी एक संघर्ष की गाथा बनेगी।" पटना की उन तंग गलियों में, जहाँ सूरज की रोशनी भी मुश्किल से पहुँचती थी, प्रिया ने अपनी उसी 'टूटी कलम' को उठाया। उसने महसूस किया कि कलम भले ही बीच से टूट गई हो, लेकिन उसकी 'निब' अभी भी पैनी है। उसने पन्ने पर लिखना शुरू किया। उसके शब्द अब सिर्फ शब्द नहीं थे, बल्कि आग के गोले थे जो समाज की रूढ़ियों को जला देने के लिए काफी थे। प्रिया के मन में एक ही सपना था— "सपनों की लेखिका" बनना। उसने सोचा कि बिहार की मिट्टी से निकली यह आवाज जब गूँजेगी, तो हर उस लड़की को हिम्मत देगी जो अपने सपनों को दबाकर बैठी है। उसने एपिसोड 4 की पहली पंक्ति लिखी: "जब कलम टूटती है, तो वह और भी गहरे निशान छोड़ती है।" प्रिया ने अपने मोबाइल की स्क्रीन की तरफ देखा। अब उसे रुकना नहीं था। उसे पता था कि रास्ता कठिन है, उसे 500 एपिसोड का लंबा सफर तय करना है, लेकिन अब उसके पास 'अटूट हौसला' था। प्रिया कुमारी के रूप में उसका पहला दिन किसी युद्ध की शुरुआत जैसा था। उसने अपनी पुरानी यादों को एक संदूक में बंद किया और चाबी को दूर फेंक दिया। कमरे की दीवार पर टंगी उसकी पुरानी तस्वीर, जिसमें वह एक सहमी हुई गीता लग रही थी, अब उसे चिढ़ा नहीं रही थी, बल्कि उसे याद दिला रही थी कि वह कितनी दूर आ चुकी है। प्रिया ने एक लंबी सांस ली और अपनी कहानी के अगले पन्नों को अपनी नयी पहचान की स्याही से रंगना शुरू कर दिया। अब न कोई डर था, न कोई झिझक। बस थी तो एक लेखिका, उसकी कलम, और एक कभी न खत्म होने वाला जज्बा। प्रिया कुमारी की इस यात्रा ने अभी बस करवट ली थी, अभी तो पूरा आसमान छूना बाकी था। कहानी जारी रहेगी...

